Foreign Portfolio Investment (FPI) क्या है? मतलब और फ़ायदे

Huzefa Kudrati अपडेट Oct 7, 2026 8 मिनट में पढ़ें

यह लेख अंग्रेज़ी से अनुवाद किया गया है। मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ें

Foreign Portfolio Investment (FPI) क्या है? मतलब और फ़ायदे

Foreign portfolio investment (FPI) का मतलब है किसी दूसरे देश की financial assets ख़रीदना, जैसे listed shares, bonds, mutual fund units या ETFs, बिना उन कारोबारों पर नियंत्रण लिए। भारत में किसी listed company के 10% से कम shares रखने वाला विदेशी निवेशक portfolio investor है; 10% या उससे ज़्यादा होने पर यह हिस्सेदारी foreign direct investment (FDI) गिनी जाती है। FPIs SEBI के पास registered होते हैं और उनके पैसे के आने-जाने पर क़रीबी नज़र रखी जाती है, क्योंकि उनसे बाज़ार हिलता है।

Foreign portfolio investment: परिभाषा

FPI की पहचान दो बातों से होती है:

  1. यह portfolio है, नियंत्रण नहीं। निवेशक shares या bonds उनके return के लिए रखता है, company चलाने के लिए नहीं।
  2. यह liquid है। ये assets बाज़ार में trade होती हैं और जल्दी बेची जा सकती हैं, किसी factory या joint venture की तरह नहीं।

आम FPI निवेशक हैं विदेशी pension funds, sovereign wealth funds, insurance companies, global mutual funds और ETFs, hedge funds और endowments। भारतीय बाज़ार की ख़बरों में इन्हें अक्सर अब भी पुराने नाम FIIs (Foreign Institutional Investors) से बुलाया जाता है। उनके flows कैसे report होते हैं, यह जानने के लिए FII और DII क्या हैं देखें।

FPI बनाम FDI

Foreign portfolio investment (FPI) Foreign direct investment (FDI)
क्या ख़रीदा जाता है Listed shares, bonds, units लंबी हिस्सेदारी: नए plants, subsidiaries, बड़े stakes
किसी listed भारतीय company में हिस्सेदारी 10% से कम 10% या उससे ज़्यादा
नियंत्रण या management में भूमिका नहीं आमतौर पर हाँ, या काफ़ी असर
कितनी आसानी से निकलता है जल्दी, बाज़ार में बेचकर धीरे; समेटना मुश्किल
अवधि छोटी से लंबी लंबी
उदाहरण एक US pension fund किसी भारतीय bank के 0.5% shares ख़रीदता है एक विदेशी company भारत में factory लगाती या ख़रीदती है

भारत में foreign portfolio investment कैसे काम करता है

  • Regulator: SEBI, SEBI (Foreign Portfolio Investors) Regulations, 2019 के तहत, जिन्होंने पहले के 2014 के नियमों की जगह ली; 2014 के नियमों ने ही सबसे पहले FIIs और दूसरे विदेशी निवेशकों को एक FPI category में मिलाया था।
  • Registration: विदेशी निवेशक एक designated depository participant (DDP) के ज़रिए register होते हैं, जो SEBI से मंज़ूर intermediary है, और उन्हें निवेशक के प्रकार और उनके अपने देश में उन पर कितना regulation है, इसके हिसाब से Category I या Category II में रखा जाता है।
  • सीमाएं: एक FPI (अपने investor group के साथ) को किसी listed company की paid-up equity का 10% से कम रखना होता है। उससे ऊपर, निवेश को FDI माना जाता है। किसी company में कुल FPI हिस्सेदारी की भी सीमा है, जो उस sector की foreign investment सीमा से जुड़ी है।
  • FPIs क्या ख़रीद सकते हैं: listed और list होने वाले shares, सरकारी और corporate bonds, mutual fund units, ETFs, REITs और InvITs, और exchange पर trade होने वाले derivatives।
  • Reporting: NSDL FPI निवेश का data छापता है, और exchanges बाज़ार बंद होने के बाद रोज़ के provisional FII/FPI ख़रीद और बिक्री के आंकड़े छापते हैं।

Foreign portfolio investment के फ़ायदे

निवेशक के लिए

  • Diversification: अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं के returns एक साथ नहीं चलते, इसलिए कई में निवेश portfolio को संतुलित कर सकता है।
  • Growth तक पहुँच: भारत जैसे उभरते बाज़ार तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में हिस्सा देते हैं।
  • Liquidity: listed securities जल्दी बेची जा सकती हैं, direct investments की तरह नहीं।
  • कम ज़िम्मेदारी: कारोबार चलाने या नियंत्रण के साथ आने वाले ownership नियम मानने की ज़रूरत नहीं।

मेज़बान देश (भारत) के लिए

  • बाज़ार के लिए पूंजी: विदेशी ख़रीद shares और bonds की मांग बढ़ाती है और companies के लिए पैसा जुटाने का ख़र्च घटा सकती है।
  • गहरे, ज़्यादा liquid बाज़ार, ज़्यादा भागीदारों और research coverage के साथ।
  • Governance का दबाव: बड़े institutional holders प्रस्तावों पर वोट करते हैं और disclosure के लिए दबाव डालते हैं।
  • विदेशी मुद्रा का आना, जो पैसा आने पर रुपये को सहारा देता है।

Risks और कमियां

  • Hot money: global बिकवाली में FPI जल्दी निकल सकता है, जिससे share की कीमतें और रुपया दोनों नीचे जाते हैं।
  • निवेशक के लिए currency risk: returns उनकी अपनी मुद्रा में मापे जाते हैं।
  • Regulation और tax का risk: नियम, tax दरें और सीमाएं बदल सकती हैं।
  • मेज़बान देश में राजनीतिक और आर्थिक risk।

Currency वह risk है जो लोगों को सबसे ज़्यादा चौंकाता है:

Bar chart: किसी भारतीय stock में 12% की बढ़त, रुपया स्थिर रहे तो 12% dollar return बनती है, रुपया 3% गिरे तो 8.6%, 6% गिरे तो 5.3% और 10% गिरे तो 0.8%Dollar return = (1 + रुपये में return) × (1 − रुपये की गिरावट) − 1

क्या भारतीय foreign portfolio investment कर सकते हैं?

हाँ, यही idea उल्टी दिशा में भी काम करता है। भारत में रहने वाले लोग RBI की Liberalised Remittance Scheme (LRS) के तहत विदेश में निवेश कर सकते हैं, जो हर व्यक्ति को हर financial year में US$250,000 तक की इजाज़त देती है, जैसे किसी overseas broker के ज़रिए US-listed shares ख़रीदना। वे ऐसे भारतीय mutual funds और ETFs के ज़रिए भी निवेश कर सकते हैं जो विदेशी assets रखते हैं, ख़ुद विदेश पैसा भेजे बिना। विदेश भेजे गए पैसे और विदेशी आय पर tax collected at source और tax के नियम लागू होते हैं, इसलिए निवेश से पहले मौजूदा नियम जाँच लें।

भारत के traders के लिए FPI flows क्यों मायने रखते हैं

सबसे बड़ी भारतीय companies का बड़ा हिस्सा FPIs के पास है, इसलिए उनकी ख़रीद-बिक्री सबसे पहले large caps, bank stocks और NIFTY में दिखती है। हफ़्तों की भारी FPI बिकवाली, कमज़ोर होता रुपया और बढ़ती US bond yields अक्सर एक साथ आते हैं। Flows को बाज़ार के मूड का संदर्भ मानें, अपने-आप में कोई trading signal नहीं: रोज़ के आंकड़े provisional होते हैं और वे कीमतों की चाल का नतीजा भी उतने ही हैं जितना कारण।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

आसान शब्दों में foreign portfolio investment क्या है?

जब एक देश के निवेशक दूसरे देश के shares, bonds या funds सिर्फ़ return के लिए ख़रीदते हैं, companies पर नियंत्रण की कोशिश किए बिना। ये निवेश liquid होते हैं और कभी भी बाज़ार में बेचे जा सकते हैं।

FPI और FDI में क्या फ़र्क है?

FPI एक passive, ख़रीदी-बेची जा सकने वाली हिस्सेदारी है, भारत में किसी listed company में 10% से कम, और management में कोई भूमिका नहीं। FDI एक लंबा निवेश है, आमतौर पर 10% या उससे ज़्यादा या पूरा कारोबार, नियंत्रण या काफ़ी असर के साथ।

Foreign portfolio investment के क्या फ़ायदे हैं?

निवेशकों के लिए: diversification, तेज़ी से बढ़ते बाज़ारों तक पहुँच और liquidity। मेज़बान देश के लिए: ज़्यादा पूंजी, गहरे और ज़्यादा liquid बाज़ार, और विदेशी मुद्रा का आना।

FPI के क्या risks हैं?

बाज़ार की volatility, currency की चाल, regulation और tax में बदलाव, और मेज़बान देश में राजनीतिक या आर्थिक झटके। मेज़बान देश के लिए मुख्य risk यह है कि FPI का पैसा अचानक निकल सकता है।

भारत में FPIs को कौन regulate करता है?

SEBI, SEBI (Foreign Portfolio Investors) Regulations, 2019 के तहत। विदेशी निवेशक एक designated depository participant के ज़रिए register होते हैं, और RBI व सरकार इससे जुड़े foreign exchange नियम तय करते हैं।

क्या FII और FPI एक ही हैं?

रोज़मर्रा की बोलचाल में, हाँ। FII पुरानी registration category थी; 2014 से SEBI विदेशी संस्थाओं को Foreign Portfolio Investors के रूप में register करता है, पर बाज़ार की reports उन्हें अब भी अक्सर FIIs कहती हैं।

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